400 करोड़ का फॉरेक्स सपाटा — एक जांच, एक गाँव और लाखों के टूटते हुए भरोसे की दास्ताँ
आजाद एक्सप्रेस समाचार के लिए सैयद नावेद की रिपोर्ट
मुफ़्त सुबह की ठंडी हवा जब नारा गाँव की गलियों में दौड़ रही थी, तो किसी को भी अंदाज़ा नहीं था कि उसी दिन उनके जीवन का एक बड़ा सिरया टूटने वाला है। जगह-जगह चाय की दुकानें, पानी के टंकियों के पास बैठी महिलाएँ और सुबह का समय बिताते हुए बुजुर्ग—सब कुछ वैसा ही था जैसा हर दिन देखा जाता था। लेकिन कुछ ही घंटों बाद गाँव की ही संकरी गलियों में बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ रूक गईं, काले-बिल्ले वाले लोग कदम-कदम पर दस्तावेज़ झटक रहे थे और एक शब्द हर ज़ुबान पर घूम रहा था: “छापेमारी।”
कहानी उस सपने से शुरू होती है जो करोड़ों लोगों को एक सरल वादे में फँसा देता है — “मासिक 5 से 6% रिटर्न।” सुनने में ऐसा लगता है मानो किसी जादू का फार्मूला मिल गया हो। बैंक के मामूली ब्याज से तंग आ चुके लोग, भविष्य की योजनाएँ, घर के सपने, बच्चों की पढ़ाई — सब कुछ थोड़ा बेहतर बन जाता है इस तरह के वादे से। मुज़फ़्फरनगर के छोटे-छोटे गाँवों में यह वादा जल्दी ही हवा की तरह फैल गया: पड़ोस वाला भी मुनाफा कमा रहा है, वह जो आया था उसने पैसे निकाल लिए — विश्वास का चक्र अपने आप बन गया।
कथित तौर पर क्यूएफएक्स, ईएफ और कुछ और नामों वाले फर्मों ने मंच तैयार किया — चमकदार ब्रॉशर, पेशेवर वेबसाइट, और विदेशी ठिकानों के हवाले। लोगों को बताया गया कि यह “क्वांटम फॉरेक्स” की दुनिया है, विशेषज्ञों द्वारा अत्याधुनिक एल्गोरिथ्म इस्तेमाल किए जा रहे हैं और इसलिए जोखिम कम व रिटर्न अधिक हैं। लविश चौधरी — जो खुद को “क्वांटम फॉरेक्स एक्सपर्ट” बताता था — और नवाब अली नामक व्यक्ति, जिन्हें बताया जाता है कि वे अब दुबई में बैठते हैं, इन कहानियों के मुखिया बनकर आए। गाँवों में उनके प्रतिनिधि, दोस्त और रिश्तेदार मिलकर निवेश जुटाते रहे — हर नया निवेशक पुराने निवेशकों को होने वाले मुनाफे की कहानियों से और आश्वस्त होता गया।
जैसा कि किसी भी पोंज़ी स्कीम का व्यवहार होता है, वास्तविकता और दर्पण के बीच की खाई धीरे-धीरे गहरी होती चली गई। शुरुआती महीनों में कुछ लोगों को उन्होंने वादा के मुताबिक मुनाफा दिया — यह विश्वास की ईंट रख दी। लेकिन असलियत यह थी कि यह कोई नियमित ट्रेडिंग मुनाफा नहीं था; यह पैसों का एक घूमता हुआ चक्र था — नए लोगों के पैसे पुराने निवेशकों को लौटाने के लिए। जितना अधिक सोशल सर्कल में यह बात फैली, उतनी ही तेज़ी से पूँजी आई — और स्वाभाविक रूप से, जितनी अधिक पूँजी, उतना बड़ा गिरना भी होने लगा।
जब एडी (एन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट) की टीम ने नारा गाँव में दस्तक दी, तो वह केवल एक पुलिसिक कार्रवाई से कहीं बढ़कर थी। यह उन अनगिनत पंक्तियों की जांच थी जो बैंक ट्रांज़ैक्शन्स, फर्मों के कागज़ात और विदेशी भुगतान चैनलों के द्वारा बन रही थीं। गाँव के कुछ पुराने निवेशक, जो छोटी रकम से शुरू हुए थे, अब बताते हैं कि कैसे उनके एक-एक लाख रुपये, जीवन-बचत और पेंशन जैसे पैसों का धागा टूट गया। कुछ ने अपने खेत गिरवी रख दिए, कुछ ने कमाने वाली बेटियों की शादी की तारीख आगे बढ़ा दी — और कुछ के लिए तो भरोसे का टुकड़ा ही नहीं बचा।
दुनिया के कारोबार में ‘दूसरी छवि’ भी है — चमकदार दफ्तर, विदेशी पते और टिकाऊ दिखने वाली वेबसाइटें। इन सबने लोगों को न केवल भरोसा दिलाया बल्कि ‘वैधता’ का आभास भी दिया। पर कथित तौर पर यही नेटवर्क विदेशी बैंकिंग चैनलों के सहारे पैसे भेजता और वापस करता हुआ दिखता था — ऐसा पैटर्न जो शुरुआती जांच में ही संदिग्ध लगने लगा। जब लोग पैसे मांगने लगे, तो उन्हें बहाने सुनने को मिले: ट्रेडिंग लॉग्स, टेक्निकल जस्टिफिकेशन्स, और “लिक्विडिटी इश्यूज़।” पर असलियत यह थी कि जितना समय उन्होंने खरीदा, उतनी ही गहरी खाई बनती गई।
कहानी के केंद्र में वे लोग हैं जिनकी आवाज़ अक्सर अनसुनी रह जाती है — छोटी दुकान का मालिक जो अपने पुराने ऋण चुका नहीं पाया, स्कूल की टीचर जिसने पत्नी-गृहस्थ के खर्चों के लिए जमा पैसे लगाए थे, और किसान जिसने अपने बेटे की पढ़ाई के लिए समझौता किया था। उनकी ज़िन्दगी के पन्नों पर जो खटाखटियाँ दिखाई दीं, वे सब उसी एक चमकदार वादे की वजह से थीं। गाँव के चौपालों पर अब चर्चा का मुद्दा यही रहता — “किसने किसको जोड़ा? किसने किसे भरोसा दिलाया?” अक्सर यही सवाल सुनने को मिलता है कि जब कोई रिश्तेदार आपको अच्छी कमाई का वादा करे, क्या आप बिना जाँच के उसकी बात मान लेंगे?
कहानी का मानवीय पक्ष यही है कि धोखाधड़ी केवल पैसा छीनकर नहीं जाती — वह आत्मसम्मान, रिश्तों और भविष्य के विश्वास को भी चुरा लेती है। नारा गाँव के रहने वाले अब हर मेल-मुलाकात में एक-दूसरे की आँखों में शंका देखते हैं। कुछ परिवार टूट चुके हैं; कुछ में मौन छा गया है। और वहीं कुछ लोग ऐसे हैं जो टूटे हुए सिक्कों से नई उम्मीद जगाने की कोशिश कर रहे हैं — छोटे-छोटे काम-धंधों से फिर से शुरुआत करने का साहस जुटाते हुए।
वहीं दूसरी ओर, दुबई की चमकदार खिड़कियों के पीछे बैठी कथित कमान—जिनके नाम चर्चा में हैं—उनके खिलाफ कानूनी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। पर कानूनी जाल हमेशा त्वरित परिणाम नहीं देता। सीमा पार मामलों, वित्तीय चैनलों और सूक्ष्म दस्तावेज़ों की पड़ताल में समय लगता है। पीड़ितों की चाह यही रहती है कि न्याय जल्द मिले और जो पैसा चोरी हुआ है, वह कुछ हिस्सों में ही सही वापस आए — ताकि टूटे जीवन के कुछ टुकड़े जोड़े जा सकें।
इस कहानी से सीखने वाली एक सख्त बात यही है — वित्तीय दुनिया में चमत्कारी वादे अक्सर खतरे की घंटी होते हैं। “मासिक 5-6%” जैसे नंबर सुनकर आँखें चमक उठती हैं, पर समझदार निवेश वही है जो पारदर्शिता, रेगुलेटरी रिकॉर्ड और कठिन सवालों से गुजर कर सामने आए। किसी भी स्कीम में शामिल होने से पहले प्रमाण, कंपनी के रजिस्ट्रेशन, रियल ट्रेडिंग लॉग्स और रेगुलेटर से सत्यापन करना ज़रूरी है। और सबसे महत्वपूर्ण — परिवार और समाज के भरोसे की कीमत को समझना; क्योंकि एक झूठा वादा सिर्फ पैसों का नहीं, रिश्तों का भी विनाश कर देता है।
नारा की गलियाँ अब उसी सुबह की तरह शांत हैं, पर उनकी शांति अब पहले सी नादान नहीं रही। चौपालों पर वह चर्चा अब चेतावनी बन कर गूँजती है: “सपने जल्दी नहीं सच होते, और तेज़ कमाई का रास्ता अक्सर कटु परिणाम देता है।” इस पाठ से उठने वाली उम्मीद यह है कि लोग जागरूक हों, सवाल पूछें और अपनों के पैसों को सुरक्षित रखने के लिए सावधानी बरतें। और उम्मीद यही भी है कि जांच पूरी हो, ज़िम्मेदारों की जवाबदेही तय हो और जो टूटे हैं—उनके जीने की राह फिर से बन जाए।
